दिसंबर (मार्गशीर्ष – पौष) माह के प्रमुख कृषि कार्य (Agricultural work in December Month):

दिसम्बर यानी मार्गशीर्ष–पौष माह में सर्दी अपने चरम पर होती है और यह रबी फसलों की वृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समय है। इस माह में गेहूं, चना, मटर, मसूर, सरसों, आलू तथा चारा फसलों की नियमित निगरानी, सिंचाई और पाले से सुरक्षा आवश्यक होती है। समय पर सिंचाई, पोषक तत्व प्रबंधन एवं मौसम के उतार–चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए किसान उत्कृष्ट उपज प्राप्त कर सकते हैं।

दिसम्बर माह में मुख्य कृषि कार्य —

  • रबी फसलों में नमी प्रबंधन एवं सिंचाई
  • गेहूं की ताजमूल अवस्था में पोषण और सिंचाई
  • पाले व कोहरे से फसलों का संरक्षण
  • तोरिया की कटाई एवं अगली फसल की बुआई
  • चारा फसलों (बरसीम, जई, रिजका) की कटाई
  • सब्जियों और मसाला फसलों में निगरानी
  • फल एवं सगंधीय पौधों में देखभाल

फसल उत्पादन (Crop Production):

🌾 दिसंबर में गेहूँ (Wheat) का पछेती बुआई प्रबंधन

दिसंबर माह में गेहूँ की पछेती बुआई के लिए सही किस्मों का चुनाव, बीज दर, उर्वरक प्रबंधन और जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होता है ताकि उत्पादकता में कमी न आए।

1. बुआई का समय एवं उन्नत किस्में

बुआई का अंतिम समय

पछेती किस्मों की बुआई एक निश्चित समय-सीमा के अंदर पूरी कर लेनी चाहिए:

  • पूर्वी भारत: 10 दिसंबर तक
  • उत्तरी भारत: 25 दिसंबर तक
  • दक्षिणी भारत: 30 दिसंबर तक
पछेती बुआई के लिए अनुमोदित प्रजातियाँ

सामान्य प्रजातियों के बजाय अनुमोदित प्रजातियों का चयन करने से उत्पादकता में कमी को रोका जा सकता है:

क्षेत्र/परिस्थितिउन्नत प्रजातियाँविशेषता
सिंचित, देरी से बुआईएच.डी.-3428 (नई प्रजाति, जिंक संवर्धित), एच.डी.-3118, एच.आई.-1621, एच.डी.-3271उच्च उपज, जलवायु अनुकूल, जैव-सशक्त, रोग प्रतिरोधक
पर्वतीय क्षेत्रवी.एल. 892, एच.एम.-375, एच.एस. 207, एच.एस. 420, एच.एस. 490पर्वतीय जलवायु के लिए अनुकूल
बहुत देरी से बुआईडी.बी.डब्ल्यू.-316 (करण प्रेमा), पी.बी.डब्ल्यू-833, सीजी-1029 (कनिष्क), एच.आई.-1634 (पूसा अहिल्या), एच.डी.-3407अत्यधिक विलंब से बुआई के लिए उपयुक्त

2. बुआई की विधि और बीज प्रबंधन

पैरामीटरविवरण
बीज दरसिंचित, लवणीय/क्षारीय मृदा और उत्तरी-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों (धान के बाद) के लिए: 125 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर
पंक्तियों की दूरीदेरी से बुआई एवं ऊसर भूमि में: 15-18 सें.मी.
बीज की गहराई4 से 5 सें.मी. होनी आवश्यक है।
बुआई का तरीकासीडड्रिल या देसी हल से ही बुआई करें। छिटकवां विधि से बचें क्योंकि इससे बीज ज्यादा लगता है, जमाव कम होता है और उपज घट जाती है।
आधुनिक उपकरणफर्टी-सीडड्रिल, जीरो-टिलड्रिल या शून्य फर्ब ड्रिल का प्रचलन बढ़ रहा है।
बीज शोधन (Seed Treatment)यदि बीज शोधित न हो, तो 1.0 कि.ग्रा. बीज को 2.5 ग्राम बाविस्टीन या 2 ग्राम कैप्टॉन अथवा 2.5 ग्राम थीरम नामक दवा से शोधित कर लें।

3. पोषक तत्व प्रबंधन (प्रति हैक्टर)

पछेती गेहूँ के लिए संतुलित पोषक तत्व आवश्यक हैं:

बेसल डोज़ (बुआई के समय)
  • गोबर की खाद: 5 से 10 टन प्रति हैक्टर की दर से मृदा में अच्छी तरह मिला दें।
  • कुल आवश्यकता: 120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 50 कि.ग्रा. पोटाश।
मृदा का प्रकारबेसल नाइट्रोजन (N)फॉस्फोरस (P)पोटाश (K)
बलुई दोमट मृदा40 कि.ग्रा.पूरी मात्रापूरी मात्रा
भारी दोमट मृदा60 कि.ग्रा.पूरी मात्रापूरी मात्रा
सूक्ष्म पोषक तत्व
कमीउपाय
जिंक (Zinc)बुआई के समय 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर डालें। कमी दिखने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का पर्णीय छिड़काव करें।
गंधक (Sulphur)अमोनियम सल्फेट या सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) जैसे गंधकयुक्त उर्वरक का प्रयोग करें।
मैंगनीज (Manganese)1.0 कि.ग्रा. मैग्नीज सल्फेट को 200 लीटर पानी में घोलकर पहली सिंचाई के 2-3 दिन पहले छिड़काव करें।
टॉप ड्रेसिंग (Top Dressing)
मृदा का प्रकारसिंचाई का समयनाइट्रोजन (N) की मात्रा
बलुई दोमट मृदापहली सिंचाई पर40 कि.ग्रा.
भारी दोमट मृदापहली सिंचाई पर60 कि.ग्रा.
बलुई दोमट मृदादूसरी सिंचाई पर (शेष)40 कि.ग्रा.

4. जल प्रबंधन (Water Management)

सिंचाई संख्याअवस्थाबुआई के दिनजल की मात्रा
पहली (क्रांतिक)ताजमूल (C.R.I.) अवस्था20-25 दिन5-6 सें.मी.
दूसरीकल्ले निकलते समय (Tillering)40-45 दिनआवश्यक
  • कुल जल आवश्यकता: गेहूँ की फसल की पूरी अवधि में लगभग 35-40 सें.मी. जल की आवश्यकता होती है, जिसके लिए सामान्यतः 4-6 सिंचाइयों की ज़रूरत होती है।
  • उपयुक्त जल प्रबंधन से कल्लों की संख्या और सम्पूर्ण वृद्धि चरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

5. खरपतवार नियंत्रण (Weed Control)

प्रमुख खरपतवार
  • संकरी पत्ती: गेहूँ का मामा (Phalaris minor), जंगली जई, मोथा, अंकरी अंकरा।
  • चौड़ी पत्ती: कृष्णनील, बथुआ, चटरी-मटरी, हिरनखुरी, सैंजी, जंगली पालक, जंगली गाजर।

ध्यान दें: खरपतवार फसलों को मिलने वाले 47% नाइट्रोजन, 42% फॉस्फोरस, 50% पोटाश, 24% मैग्नीशियम एवं 39% कैल्शियम तक का उपयोग कर लेते हैं।

रासायनिक नियंत्रण (प्रति हैक्टर)
  • समय: पहली सिंचाई के बाद, परन्तु फसल की 30 दिनों की अवस्था से पूर्व छिड़काव करें।
  • दवाएँ: खरपतवारनाशी का प्रयोग केवल अधिक मात्रा में खरपतवार होने पर ही सावधानीपूर्वक करें।
  • संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित में से किसी एक का 600-800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें:
    • सल्फोसल्फ्यूरॉन 75 डब्ल्यू.पी. की 33 ग्राम
    • टाइसोप्रोट्यूरॉन 75 डब्ल्यू.पी. + मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 20 डब्ल्यू.पी. की 1.0-1.3 कि.ग्रा. + 20 ग्राम
    • सल्फोसल्फ्यूरॉन 75 प्रतिशत + मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 5 प्रतिशत की 40 ग्राम
    • क्लोडिनाफॉप 15 प्रतिशत + मैटसफ्ल्यूरॉन मिथाइल 1 प्रतिशत वेस्टा 15 डब्ल्यू.पी. की 600-800 लीटर मात्रा।

🌾 जौ (Barley) की खेती: जल प्रबंधन एवं खरपतवार नियंत्रण

जौ, अन्य दाने वाली फसलों की तुलना में कम जल की आवश्यकता वाली फसल है, लेकिन उपज के लिए क्रांतिक अवस्थाओं में सिंचाई आवश्यक है।

1. जल प्रबंधन (Water Management)

जौ की खेती के लिए सामान्यतः 2 से 3 सिंचाई की आवश्यकता होती है।

सिंचाई की संख्यासिंचाई का समयबुआई के दिनअवस्था
एक सिंचाईकल्ले बनते समय30-35 दिनों बादक्रांतिक अवस्था
पहली सिंचाईसक्रिय कल्ले फूटने की अवस्था25-30 दिनों बादक्रांतिक अवस्था
दूसरी सिंचाईबाली आने की अवस्था65-70 दिनों बादक्रांतिक अवस्था
  • विशेष ध्यान:
    • क्षारीय व लवणीय मृदा में अधिक संख्या में हल्की सिंचाई देना उत्तम माना जाता है।
    • सिंचाई के बाद, नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा यानी 66 कि.ग्रा. यूरिया 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से टॉप ड्रेसिंग करें।

2. खरपतवार नियंत्रण (Weed Control)

जौ की फसल स्वभाव से शीघ्र बढ़ने वाली होती है और यह अन्य खरपतवारों को बढ़ने नहीं देती है। अतः, खरपतवारनाशी का प्रयोग केवल अधिक मात्रा में खरपतवार होने पर ही सावधानीपूर्वक करें।

खरपतवारनाशी का प्रयोग

सभी खरपतवारनाशियों का प्रयोग बुआई के 30-35 दिनों बाद 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टर की दर से करना चाहिए:

खरपतवार का प्रकारनियंत्रण के लिए उपयुक्त दवाएँ (प्रति हैक्टर)
संकरी पत्ती वाले (जंगली जई, गुल्ली डंडा)पेण्डीमेथिलीन 30 प्रतिशत 3.5 लीटर या आइसोप्रोट्यूरॉन 75 प्रतिशत1.25 कि.ग्रा.
चौड़ी पत्ती वाले (बथुआ, जंगली गाजर, हिरनखुरी)2,4-डी (सोडियम लवण 80 प्रतिशत) 650 ग्राम
संकरी पत्ती हेतु अन्य विकल्प2,4-डी एस्टर 750 ग्राम या आइसोगार्ड प्लस 1.25 कि.ग्रा. या आइसोप्रोट्यूरॉन (75 प्रतिशत) 1.0 कि.ग्रा.

🌽 शीतकालीन (रबी) मक्का प्रबंधन

दिसंबर माह में मक्का की फसल को अधिकतम उपज के लिए नमी और पोषक तत्वों की सही मात्रा, साथ ही कीटों से बचाव की आवश्यकता होती है।

1. जल प्रबंधन एवं निराई-गुड़ाई

रबी मक्का में सामान्यतः 4 से 6 सिंचाई की आवश्यकता होती है।

  • पहली सिंचाई:
    • बुआई के 20−25 दिनों बाद पहली निराई-गुड़ाई करके सिंचाई कर दें।
  • आगे की सिंचाई:
    • पुनः समुचित नमी बनाए रखने के लिए समय-समय पर सिंचाई करते रहें।

2. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग (Top Dressing)

नाइट्रोजन की सही मात्रा सही समय पर देने से पौधे की बढ़वार अच्छी होती है:

ड्रेसिंगसमययूरिया की मात्रा (प्रति हैक्टर)शर्त
प्रथम टॉप ड्रेसिंगबुआई के लगभग 30−35 दिनों बाद (जब पौधे घुटने तक ऊँचे हों)87 कि.ग्रा.खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
दूसरी टॉप ड्रेसिंगनर मंजरी निकलने से पूर्व87 कि.ग्रा.खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

3. खरपतवार नियंत्रण

मक्का के खेत को शुरू के 45 दिनों तक खरपतवार रहित रखना चाहिए।

  • यांत्रिक विधि: 2−3 निराई-गुड़ाई पर्याप्त रहती है।
  • रासायनिक विधि:
    • खरपतवारों को एट्राजिन की 1−1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के बाद, परंतु जमाव से पहले छिड़काव करके नियंत्रित किया जा सकता है।

4. पौध संरक्षण (Pest Management)

मक्का को कई कीट नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिनका नियंत्रण तुरंत आवश्यक है:

कीट का नामपहचान/क्षतिरोकथाम/उपचार
वृंत बेधक (Stem Borer)शुरुआती अवस्था में पत्तियों पर छोटे छिद्र दिखाई देते हैं।4 प्रतिशत कार्बोफ्यूरॉन दाने को प्रभावित पौधों में बिना देरी किए डालना चाहिए।
अन्य कीट (पाइरिला, आर्मीवर्म, कटवर्म)फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।मोनोक्रोटोफॉस के छिड़काव से इनकी रोकथाम की जा सकती है।

🌱 चना (Chana/Chickpea) फसल प्रबंधन: दिसंबर माह के कार्य

दिसंबर माह में चने की देर से बुआई (Late Sowing), खरपतवार प्रबंधन और क्रांतिक अवस्था में जल एवं पोषक तत्वों का प्रबंधन उपज के लिए महत्वपूर्ण है।

1. बुआई का समय एवं विधि

  • देर से बुआई: उत्तरी भारत में धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास एवं गन्ने की फसल कटने के बाद, जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं, चने की बुआई नवंबर के अंत तक या दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक कर सकते हैं।
  • उकठा रोग से बचाव: उकठा रोग की रोकथाम के लिए बुआई अक्टूबर के अंत या नवंबर के प्रथम सप्ताह में कर देनी चाहिए (यद्यपि दिसंबर तक बुआई का विकल्प उपलब्ध है)।
  • रोगरोधी किस्में: उकठा रोगरोधी देसी प्रजातियां (पूसा-372, जेजी 11, जेजी 12, जेजी 16) और काबुली प्रजातियां (पूसा चमत्कार, जवाहर काबुली चना-1, विजय, फूले जी-95311) का चयन करें।

2. जल प्रबंधन (Water Management)

क्षेत्रसिंचाइयों की संख्याक्रांतिक अवस्थाध्यान दें
उत्तर-पूर्वी मैदानीएक सिंचाईफूल बनते समयफूल आने की अवस्था में सिंचाई न करें अन्यथा फूल गिर सकते हैं।
उत्तर-पश्चिमी मैदानीदो सिंचाइयां1. शाखा निकलते समय 2. फली बनते समयदलहनी फसलों में स्प्रिंक्लर विधि से सिंचाई करना सर्वोत्तम है।
मध्य भारतदो सिंचाइयां1. शाखा निकलते समय 2. फली बनते समयअत्यधिक वानस्पतिक वृद्धि से बचें।

3. खरपतवार नियंत्रण और पोषण (Nipping & Nutrition)

कार्यसमयलाभ/उद्देश्य
निराई-गुड़ाईबुआई के 30 दिनों बाद एक बार।जड़ों की अच्छी बढ़वार होती है और अधिक उपज प्राप्त होती है।
निपिंग (शीर्ष तुड़ाई)बुआई के 35-40 दिनों बादशीर्ष कलिका की तुड़ाई से अधिक शाखाएं बनती हैं, जिससे पैदावार बढ़ती है।
पर्णीय छिड़कावशाखाओं के बनते समय अथवा फली बनते समयदेर से बोयी गई फसल में 2 प्रतिशत यूरिया/डीएपी के घोल का छिड़काव करने से अच्छी पैदावार मिलती है।

4. पौध संरक्षण (Plant Protection)

अ. झुलसा रोग (Blight Disease)

नियंत्रण: इस रोग की रोकथाम के लिए 10 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।

  • रासायनिक विकल्प (प्रति एकड़):
    • क्लोरोथालोनिल 70 डब्ल्यू पी 300 ग्राम।
    • कार्बण्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% डब्ल्यू पी 500 ग्राम।
    • टेबुकोनाजोल 50% + ट्राबुफ्लोक्सीस्ट्रोबिन 25% डब्ल्यू जी 100 ग्राम।
    • या 2.0 कि.ग्रा. जिंक मैग्नीज कार्बामेट को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
  • जैविक उपचार (प्रति एकड़):
    • ट्राइकोडर्मा विरिडी 500 ग्राम की दर से छिड़काव करें।
    • स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस 250 ग्राम की दर से छिड़काव करें।
ब. उकठा रोग (Wilt Disease)

यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंद से होता है और गंभीर हानि पहुँचाता है।

  • लक्षण: शुरुआत में पत्तियां सूख जाती हैं, फिर पूरा पौधा मुरझाकर सूख जाता है। ग्रसित पौधे की जड़ के पास चीरा लगाने पर काली संरचना दिखाई देती है।
  • रोकथाम:
    • बीजोपचार: 2.5 ग्राम कार्बण्डाजिम या 2 ग्राम थीरम या 2 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
    • किस्मों का चयन: उकठा रोगरोधी किस्मों का ही चयन करें (जैसा कि ऊपर बताया गया है)।
    • उचित दूरी: पौधों की बुआई उचित दूरी पर करनी चाहिए।

🟢 मटर फसल प्रबंधन: दिसंबर माह के कार्य

दिसंबर में मटर की फसल क्रांतिक अवस्था में होती है, जहाँ रोगों और कीटों से बचाव उपज के लिए आवश्यक है।

1. जल प्रबंधन एवं निराई-गुड़ाई

  • पहली सिंचाई: मटर की फसल में बुआई के 35-40 दिनों पर पहली सिंचाई करें।
  • आगे की सिंचाई: आवश्यकतानुसार अतिरिक्त सिंचाई की जा सकती है।
  • निराई-गुड़ाई: इस दौरान खेत की निराई-गुड़ाई करना फायदेमंद रहता है, जिससे जड़ों की वृद्धि अच्छी होती है।

2. पौध संरक्षण (Plant Protection)

अ. चूर्णिल आसिता (Powdery Mildew)

यह रोग पौधे की पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसा दिखता है। इसकी रोकथाम के लिए निम्नलिखित का प्रयोग करें:

उपचार विधिदवा का नाम (प्रति हैक्टर)मात्राअंतराल
सल्फर आधारितसल्फेक्स (Sulfex)2.5 कि.ग्रा. (800-1000 लीटर पानी में घोलकर)15 दिनों के अंतराल में 2-3 बार
अन्य कवकनाशीघुलनशील गंधक0.2-0.3 प्रतिशतआवश्यकतानुसार छिड़काव
अन्य कवकनाशीकार्बण्डाजिम1 ग्राम/लीटर पानीआवश्यकतानुसार
अन्य कवकनाशीडीनोकैप, केराथेन 48 ई.सी.0.5 मि.ली./लीटर पानीआवश्यकतानुसार
ब. रतुआ (Rust)

इस रोग की रोकथाम के लिए 600-800 लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़काव करें:

दवा का नाम (प्रति हैक्टर)मात्रा
मैंकोजेब (Mancozeb)2.0 कि.ग्रा.
डाइथेन एम-45 (Dithane M-45)2.0 कि.ग्रा.
हेक्साकोनाजोल (Hexaconazole)1 लीटर
प्रोपीकोना (Propiconazole)1 लीटर
  • सावधानी: उचित फसलचक्र अपनाएं और रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें।

3. कीट नियंत्रण (Pest Control)

  • सामान्य कीट क्षति: इण्डोक्साकॉर्ब (1 मि.ली./लीटर पानी) का छिड़काव कीटों से होने वाली क्षति को कम करता है।
  • विशिष्ट कीटों का नियंत्रण (800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें):
कीट का नामदवा का नाममात्रा
तनाछेदक कीट (Stem Borer)डाइमिथोएट 30 ई.सी.1.0 लीटर
फलीछेदक कीट (Pod Borer)मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी.750 मि.ली.

🌰 मसूर फसल प्रबंधन: दिसंबर माह के कार्य

मसूर एक कम पानी की आवश्यकता वाली दलहनी फसल है, लेकिन सही समय पर सिंचाई और रोग नियंत्रण से उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

1. जल प्रबंधन (Water Management)

  • आवश्यकता: मसूर की फसल में अधिक पानी की आवश्यकता नहीं है।
  • सिंचाई की संख्या: अधिक पैदावार के लिए 1 या 2 सिंचाई पर्याप्त होती है।
  • क्रांतिक अवस्था: सिंचाई का समय पुष्पावस्था से पूर्व (बुआई के लगभग 40-45 दिनों बाद) होना चाहिए।
  • सावधानियाँ:
    • यदि पर्याप्त वर्षा हो जाती है, तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।
    • खेत में अधिक पानी होने पर मसूर पर प्रतिकूल असर होता है, इसलिए जल निकास की उचित व्यवस्था का होना बेहद जरूरी है।

2. पौध संरक्षण (Plant Protection)

समस्या का नामप्रकारनियंत्रण हेतु उपचार
माहूं (Aphids) का प्रकोपकीटडाइमिथोएट (0.03 प्रतिशत) का छिड़काव करें।
रतुआ रोग (Rust)फफूंद जनित रोगघुलनशील गंधक (0.2-0.3 प्रतिशत) अथवा मैंकोजेब (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव करें।
सामान्य रोकथामरोग/कीटरोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें।

🔴 अरहर फसल प्रबंधन: दिसंबर माह के कार्य

दिसंबर में अरहर की कम अवधि वाली किस्में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं, जबकि खड़ी फसल में फली छेदक कीट का प्रबंधन उपज के लिए महत्वपूर्ण होता है।

1. कीट प्रबंधन: फली छेदक (Pod Borer)

फली छेदक कीट (Pod Borer) अरहर को सबसे अधिक क्षति पहुँचाता है।

कार्यसमयउपचार
प्रबंधन आरंभजब यौन आकर्षण जाल में लगातार 3-4 रातों तक 4-5 लार्वा जाएँ।तुरंत कीट प्रबंधन शुरू करें।
प्रथम छिड़कावप्रारंभिक अवस्था मेंइण्डोक्साकार्ब (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
द्वितीय छिड़कावआवश्यकतानुसारनिबौली (नीम) के सत्त 5 प्रतिशत का छिड़काव करें।
तृतीय एवं चतुर्थ छिड़कावआवश्यकता होने परनिबौली के सत्त अथवा न्यूक्लियर पॉलीहेड्रोसिस विषाणु (250 लार्वा समतुल्य/हैक्टर) की दर से छिड़काव करें।

2. कटाई एवं भंडारण

जून में बोई गई कम अवधि की अरहर की किस्में दिसंबर में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं।

  • कटाई का समय: फसल का रंग सुनहरा भूरा होने पर कटाई कर लेनी चाहिए।
  • सुखाना: कटाई के बाद फसल को लगभग 7-8 दिनों तक खेत में सुखाएँ।
  • मड़ाई (Threshing):
    • सूखी फसल की मड़ाई की जानी चाहिए।
    • अरहर स्ट्रिपर मशीन 150 कि.ग्रा. प्रति घंटे की क्षमता के साथ पौधे को बिना क्षति पहुँचाए, फलियों और पत्तियों को अलग कर देता है।
    • इस प्रकार अलग की गई फलियों और पत्तियों की वर्टिकल थ्रेशर से मड़ाई की जा सकती है।
  • भंडारण: उपयुक्त नमी पर फसल का भण्डारण करने से बाजार में अच्छा मूल्य प्राप्त हो जाता है।

🟡 राई-सरसों और तोरिया/लाही प्रबंधन

दिसंबर माह में सरसों की अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्नत किस्मों का चयन, पाले से सुरक्षा और समय पर सिंचाई तथा कीट नियंत्रण आवश्यक है।

1. बुआई और किस्में

  • देर से बुआई: जिन क्षेत्रों में समय पर बुआई नहीं हो पाई है, वहाँ मध्य दिसंबर तक बुआई की जा सकती है।
  • उन्नत प्रजातियाँ: पूसा सरसों 25, पूसा सरसों 26 और पूसा सरसों 28 जैसी कम अवधि की प्रजातियाँ देरी से बुआई करने पर भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम हैं।

2. जल प्रबंधन और टॉप ड्रेसिंग

सरसों में सिंचाई जल की उपलब्धता के आधार पर करें, और नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा का उपयोग सिंचाई के बाद करें।

जल उपलब्धतासिंचाई का समयअवस्था
एक सिंचाई50-60 दिनों की अवस्था परक्रांतिक अवस्था
दो सिंचाईपहली: 40-50 दिनों बाद
दूसरी: 90-100 दिनों बाद
तीन सिंचाईपहली: 30-35 दिनों बाद
अन्य दो: 30-35 दिनों के अंतराल पर

3. पाले से बचाव (Frost Protection)

दिसंबर के अंतिम सप्ताह में तापमान में तीव्र कमी से पाले की आशंका रहती है, जिससे फसल की बढ़वार और फली विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

  • रासायनिक उपचार: 0.2 प्रतिशत तुड़ाई मिथाइल सल्फोऑक्साइड अथवा 0.1 प्रतिशत थायो यूरिया का छिड़काव लाभप्रद होता है। सल्फरयुक्त रसायनों का प्रयोग लाभकारी होता है।
  • सिंचाई: पाला पड़ने के समय सिंचाई करने से भी पाले का दुष्प्रभाव कम होता है।

4. खरपतवार नियंत्रण

सरसों की फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना आवश्यक है।

विधिसमयदवा/क्रियामात्रा (प्रति हैक्टर)
यांत्रिक विधि20-25 दिनों में एक बारनिराई-गुड़ाईअच्छी और जल्दी बढ़वार के लिए।
रासायनिक (बुआई पूर्व)बुआई से पूर्वफ्लूक्लोरेलिन (45 ई.सी.)2.2 लीटर (600-800 लीटर पानी में घोलकर)
रासायनिक (अंकुरण पूर्व)बुआई के बाद, परन्तु अंकुरण से पूर्वपेण्डीमेथिलीन (30 ई.सी.)3.3 लीटर (600-800 लीटर पानी में घोलकर)
पौध छंटाई15-20 दिनों के अन्दरघने पौधों को निकालकर आपसी दूरी 15 सें.मी. करें।आवश्यक है।

5. कीट नियंत्रण

सरसों की फसल पर **माहूं (एफिड) ** और आरा मक्खी मुख्य हानिकारक कीट हैं। माहूं कीट 35-70 प्रतिशत तक उपज और 5-10 प्रतिशत तक तेल की प्राप्ति में कमी करता है।

  • नियंत्रण शुरू करें: जब कीट का प्रकोप औसतन 25 कीट प्रति पौधा या 10 प्रतिशत पौधों पर हो जाए।
  • दवाएँ (प्रति हैक्टर 600-800 लीटर पानी में घोलकर):
    • इमिडाक्लोप्रिड (17.8 प्रतिशत) 20-25 ग्राम
    • मोनोक्रोटोफॉस 35 डब्ल्यू.एस.सी. सक्रिय तत्व
    • डाइमेथोएट 30 ई.सी.
    • मिथाइल डिमेटॉन 25 ई.सी.
    • क्विनालफॉस 25 ई.सी.
    • फॉस्फोमिडॉन 85 डब्ल्यू.एस.सी. 250 मि.ली.
    • थायामिडॉन 25 ई.सी. 1000 मि.ली.

6. कटाई (तोरिया/लाही)

  • समय: तोरिया में दाना झड़ने की आशंका रहती है। इसलिए सही समय पर इसकी कटाई कर लेनी चाहिए।
  • अगली फसल: तोरिया की कटाई के बाद खेत को अगली फसल (जैसे पछेती गेहूं, गन्ना, प्याज) के लिए तैयार करें।

🌿 पेड़ी गन्ना (Ratoon) एवं शरदकालीन गन्ना प्रबंधन

दिसंबर माह में गन्ने की कटाई, विशेषकर पेड़ी गन्ने के फुटाव (Sprouting) को सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन के तरीके अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कम तापमान फुटाव को प्रभावित करता है।

1. पुराने गन्ने की कटाई और फुटाव प्रबंधन

कार्यविवरणउद्देश्य
गन्ने की कटाईगन्ने की तकरीबन सभी किस्में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। पुराने गन्ने की कटाई का कार्य जमीन की सतह से सटाकर करें।इससे पेड़ी गन्ने का फुटाव बेहतर होता है।
अवशेषों का प्रबंधनकटाई के बाद खेत की तैयारी के समय अवशेषों को निकालकर नष्ट कर दें।साफ खेत फुटाव को प्रोत्साहित करता है।
खरपतवारनाशक का प्रयोगगन्ना काटने के तुरन्त बाद ठूंठों पर 2,4-डी खरपतवारनाशक (1.5 से 2 लीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर) का छिड़काव करें।यह खरपतवार नियंत्रण के साथ फुटाव में भी सहायक है।
मल्चिंग (Mulching)गन्ने की सूखी पत्तियों की 15-20 सें.मी. मोटी तह सतह के ऊपर बिछा दें।इससे फुटाव अधिक होगा, क्योंकि यह ठूंठों को गर्मी प्रदान करती है।

2. शरदकालीन गन्ना प्रबंधन

शरदकालीन (Autumn) गन्ने की फसल में दिसंबर में निम्नलिखित कार्य आवश्यक हैं:

  • सिंचाई: यदि पिछले महीने सिंचाई नहीं की है, तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। इससे गन्ना सूखने नहीं पाएगा और वजनी (भारी) भी बनेगा।
  • अंतः फसल (Intercropping): शरदकालीन गन्ने में सरसों, धनिया जैसी अंतः फसलें लगाएँ।
  • जैविक उपचार: ट्राइकोडर्मा की 20 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें।
  • अन्य कार्य: नियमित रूप से निराई-गुड़ाई करते रहें।

🌿 बरसीम और जई: चारा फसल प्रबंधन

दिसंबर माह में बरसीम और जई दोनों ही फसलें कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। इन फसलों से अधिकतम चारा उपज प्राप्त करने के लिए सही कटाई और पोषण प्रबंधन आवश्यक है।

1. बरसीम (Berseem) प्रबंधन

बरसीम एक बहु-कटाई वाली (Multi-cut) फसल है, जिसके लिए निरंतर पोषण और नमी ज़रूरी है।

कार्यसमय/मात्राविवरण
पहली कटाईजब फसल 50-55 दिनों की हो जाए।कटाई करते समय ध्यान रहे कि यह 5-6 सें.मी. ऊपर से की जाए, ताकि बाद में वृद्धि अच्छी हो सके।
आगे की कटाई20-30 दिनों के अंतराल परनिरंतर चारा प्राप्त करने के लिए।
सिंचाईप्रत्येक कटाई के बादबरसीम में हर कटाई के बाद सिंचाई आवश्यक है।
टॉप ड्रेसिंगप्रत्येक कटाई के बाद20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से यूरिया की टॉप ड्रेसिंग फसल की बढ़वार के लिए अवश्य करें।
रोग नियंत्रणयदि तना विगलन रोग के लक्षण दिखें।बहु-कटाई वाली फसलों की कटाई समय पर करें (ताकि रोग का प्रसार कम हो)।

2. जई (Oat) प्रबंधन

जई का उपयोग हरे चारे और बीज दोनों के लिए किया जाता है, जिसके लिए प्रबंधन के तरीके अलग-अलग होते हैं।

उद्देश्य/कार्यसमय/मात्राविवरण
पहली सिंचाईबुआई के 20-25 दिनों बादयह कल्ले फूटने (Tillering) में सहायक है।
टॉप ड्रेसिंगपहली सिंचाई के बाद20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की दर से टॉप ड्रेसिंग करें।
सिंचाई (चारे हेतु)20-25 दिनों के अंतराल परचारे की निरंतर आपूर्ति के लिए नमी बनाए रखें।
चारे हेतु कटाईबुआई के 55-60 दिनों बादकटाई जमीन के ऊपर 8-10 सें.मी. से करनी चाहिए, जिससे कल्ले अच्छे निकलते हैं।
बीज हेतु प्रबंधनपहली कटाई के बादबीज प्राप्त करने के लिए पहली कटाई के बाद फसल छोड़ दें।

सब्जियों की खेती (Vegetable Farming):

🥔 आलू फसल प्रबंधन: दिसंबर माह के कार्य

दिसंबर माह में पछेती आलू की फसल को ठंड से बचाना और सही समय पर पोषण देना, दोनों ही अच्छी उपज के लिए महत्वपूर्ण हैं।

1. जल प्रबंधन (Water Management)

  • सिंचाई का अंतराल: जरूरत के मुताबिक 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें।
  • नमी बनाए रखें: खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें।
  • पाले से बचाव हेतु सिंचाई: दिसंबर और जनवरी में अधिक ठंड की आशंका होने पर फसल की सिंचाई कर देनी चाहिए।
    • लाभ: जमीन भीगी रहने पर पाले का असर कम हो जाता है।

2. पोषण एवं मिट्टी चढ़ाना

कार्यसमयमात्रा (प्रति हैक्टर)
पहली टॉप ड्रेसिंगबुआई के 25 दिनों बाद87 कि.ग्रा. यूरिया या गोबर खाद
मिट्टी चढ़ानापहली टॉप ड्रेसिंग के साथगोबर खाद या यूरिया डालने के बाद मिट्टी चढ़ाएं।
अंतिम टॉप ड्रेसिंगबाद की अवस्था मेंनाइट्रोजन की शेष एक तिहाई मात्रा (यूरिया या कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट के रूप में)।
अंतिम मिट्टी चढ़ानाअंतिम टॉप ड्रेसिंग के साथखेत में डालकर मोटी मेड़ बनाकर मिट्टी चढ़ाएं।
पहाड़ी क्षेत्रआवश्यकतानुसारआलू के खेत में निराई-गुड़ाई करें।

3. पाला एवं धुआँ प्रबंधन

ठंड और पाले से फसल की सुरक्षा के लिए:

  • सिंचाई: अधिक ठंड या पाले की आशंका पर तुरंत सिंचाई कर दें।
  • धुआँ: पाले से बचाने के लिए धुएं का प्रबंधन करें (जैसे खेत के चारों ओर कूड़ा-कचरा/घास-फूस जलाकर)।

🌸 फूलगोभी फसल प्रबंधन: उन्नत किस्में और पोषण

दिसंबर-जनवरी में तैयार होने वाली फूलगोभी की किस्में आमतौर पर मध्य या मध्य-पछेती समूह की होती हैं।

1. उन्नत किस्में (Improved Varieties)

किस्म का नामसमूहकटाई का समयफूल का विवरणरोपाई के बाद तैयारीऔसत उपज (प्रति हैक्टर)
पूसा पौषजामध्य पछेतीदिसंबर-जनवरीसफेद, ठोस, औसतन 900 ग्राम वजनी।लगभग 85 दिन300-350 क्विंटल
पूसा शुक्तिमध्यम पछेतीदिसंबर-जनवरीगठीले, सफेद, उत्तम गुणवत्ता के।75-80 दिन400-440 क्विंटल
पूसा हाइब्रिड-2मध्य अगेतीनवंबर-दिसंबरसफेद और ठोस। पौधे मध्यम आकार के।लगभग 80 दिनलगभग 230 क्विंटल
  • पूसा हाइब्रिड-2 की विशेषता: यह जुलाई के अंत में बुआई के लिए उपयुक्त है और डाउनी मिल्ड्यू रोग से प्रतिरोधी है।

2. पोषण प्रबंधन (Nutrient Management)

पछेती फूलगोभी में पौधों के संतुलित विकास और फूलों की बेहतर गुणवत्ता के लिए नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग महत्वपूर्ण है:

टॉप ड्रेसिंगमात्रा (प्रति हैक्टर)रोपाई के बाद समयउद्देश्य
पहली टॉप ड्रेसिंग40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन20-25 दिनों बादपौधों का प्रारंभिक और संतुलित विकास।
दूसरी टॉप ड्रेसिंग40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन45-50 दिनों बादफूलों की गुणवत्ता बेहतर बनाना।

🥬 गांठगोभी एवं बंदगोभी प्रबंधन

दिसंबर माह में गोभीवर्गीय फसलों (Cauliflower family) के लिए पोषण, खरपतवार नियंत्रण और नमी बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

1. गांठगोभी (Knol Khol) प्रबंधन

गाँठगोभी के पौधों के संतुलित विकास के लिए नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग आवश्यक है:

टॉप ड्रेसिंगमात्रा (प्रति हैक्टर)रोपाई के बाद समय
प्रथम टॉप ड्रेसिंग34 कि.ग्रा. नाइट्रोजन20-25 दिनों बाद
दूसरी टॉप ड्रेसिंग34 कि.ग्रा. नाइट्रोजन45-50 दिनों बाद

2. बंदगोभी (Cabbage) प्रबंधन

बंदगोभी की अच्छी बढ़वार के लिए खरपतवार नियंत्रण और सही जल प्रबंधन ज़रूरी है:

अ. खरपतवार नियंत्रण
  • रासायनिक नियंत्रण: खरपतवारनाशी पेण्डीमेथिलीन या वासालीन का छिड़काव रोपाई से एक-दो दिन पहले करें।
  • सिंचाई: छिड़काव के पश्चात् तुरन्त हल्की सिंचाई करें।
ब. जल प्रबंधन
  • नमी बनाए रखना: फसल बढ़वार के समय पूर्ण नमी बनाए रखें तथा आवश्यकतानुसार समय-समय पर सिंचाई अवश्य करें।
स. अन्य कार्य
  • मिट्टी चढ़ाना: सामान्यतः गोभीवर्गीय फसलों में जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाना लाभदायक होता है (पौधों को सहारा देने और गांठ/फूल के सही विकास के लिए)।

🌶️ मिर्च (Chilli) और शिमला मिर्च (Capsicum) प्रबंधन

दिसंबर-जनवरी में मिर्च (शिमला मिर्च सहित) की रोपाई की जाती है। अच्छी उपज के लिए सही पोषण और रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

1. रोपाई एवं जल प्रबंधन

कार्यविवरण
बुआईशिमला मिर्च के लिए अक्टूबर में बुआई उपयुक्त है।
रोपाईमिर्च/शिमला मिर्च की रोपाई दिसंबर-जनवरी में उपयुक्त है।
दूरीसामान्यतः पंक्ति से पंक्ति की दूरी और पौधे से पौधे की दूरी 45 सें.मी. पर्याप्त होती है।
सिंचाईआवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें।

2. पोषक तत्व प्रबंधन (प्रति हैक्टर)

मिर्च की फसल में संतुलित पोषण उपज के लिए महत्वपूर्ण है।

पोषक तत्वबुआई के समय (बेसल डोज़)रोपाई के बाद टॉप ड्रेसिंग
नाइट्रोजन (N)50 कि.ग्रा.50 कि.ग्रा. (30-35 दिनों बाद)
फॉस्फोरस (P)100 कि.ग्रा.
पोटाश (K)100 कि.ग्रा.

3. पौध संरक्षण (Plant Protection)

अ. शीर्षारंभी क्षय (Dieback) एवं फल सड़न रोग

इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार और छिड़काव दोनों आवश्यक हैं।

  1. बीजोपचार: काबॅण्डाजिम 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।
  2. रोग लक्षण दिखने पर छिड़काव (प्रति लीटर पानी):
    • क्लोरोथैलोनील 1.5 ग्राम
    • डाइफेनोकोनाजोल 1.0 ग्राम
    • प्रोपिनेब 3.5 ग्राम
    • टेबुकानाजोल 1.0 ग्राम
    • एजोक्सीस्ट्रॉबिन 1.0 ग्राम
ब. झुलसा रोग (Blight Disease)

झुलसा रोग की रोकथाम के लिए एकीकृत प्रबंधन आवश्यक है।

  1. बीज और फसल चक्र:
    • स्वस्थ बीजों का प्रयोग करें।
    • गैर सोलनेसी कुल (Non-Solanaceae family) के पौधों का उपयोग कर फसल चक्र अपनाएं।
  2. छिड़काव (प्रति लीटर पानी): रोगों के लक्षण दिखने पर निम्नलिखित में से किसी एक का छिड़काव अवश्य करें:
    • मैंकोजेब 2 ग्राम
    • जिनेब 2 ग्राम
    • साइमोक्सानिल + मैंकोजेब 1.5-2 ग्राम
    • एजोक्सीस्ट्रॉबिन 1 ग्राम

🍅 टमाटर फसल प्रबंधन: बसंत-ग्रीष्म ऋतु की फसल

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में टमाटर की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए दिसंबर-जनवरी में सही प्रबंधन आवश्यक है।

1. बुआई, रोपाई का समय एवं किस्में

  • बुआई का समय: बसंत-ग्रीष्म ऋतु की फसल के लिए पौधशाला में बीज की बुआई कर दें।
  • रोपाई का समय: दिसंबर से जनवरी में तैयार पौध की रोपाई करें।
  • बीज दर (प्रति हैक्टर):
    • उन्नत किस्में: 350-400 ग्राम
    • संकर किस्में: 200-250 ग्राम
  • उपयुक्त उन्नत/संकर किस्में: पूसा हाइब्रिड-1, पूसा उपहार, पूसा-120, पूसा शीतल, पूसा सदाबहार प्रमुख हैं।

2. मृदा एवं रोपाई की दूरी

पैरामीटरविवरण
उपयुक्त मृदाउचित जल निकास वाली रेतीली दोमट या दोमट भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश उपलब्ध हो। जल निकास की उचित व्यवस्था आवश्यक है।
रोपाई का समयशाम के समय रोपाई करें।
सीमित बढ़वार वाली प्रजातियाँ60 सें.मी. (पंक्ति से पंक्ति) x 60 सें.मी. (पौधे से पौधे)
असीमित बढ़वार वाली प्रजातियाँ75-90 सें.मी. (पंक्ति से पंक्ति) x 60 सें.मी. (पौधे से पौधे)

3. पोषक तत्व प्रबंधन (प्रति हैक्टर)

रोपाई से एक माह पहले गोबर या कम्पोस्ट की अच्छी सड़ी खाद (20-25 टन/हैक्टर) भूमि में अच्छी तरह मिला लें।

बेसल डोज़ (बुआई के समय)
किस्म का प्रकारनाइट्रोजन (N)फॉस्फोरस (P)पोटेशियम (K)
उन्नत किस्में75 कि.ग्रा.100 कि.ग्रा.50 कि.ग्रा.
संकर/असीमित बढ़वार वाली50 कि.ग्रा.250 कि.ग्रा.100 कि.ग्रा.
टॉप ड्रेसिंग (Top Dressing)
किस्म का प्रकारटॉप ड्रेसिंग की मात्रा (N)पहली टॉप ड्रेसिंगदूसरी टॉप ड्रेसिंग
उन्नत किस्में40 कि.ग्रा.रोपाई के 20-25 दिनों बादरोपाई के 45-50 दिनों बाद
संकर/असीमित बढ़वार वाली55-60 कि.ग्रा.रोपाई के 20-25 दिनों बादरोपाई के 45-50 दिनों बाद

4. अंतः सस्यन एवं खरपतवार नियंत्रण

  • निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना: अच्छी पैदावार के लिए हल्की निराई-गुड़ाई करें व पौधों की जड़ों के पास मिट्टी चढ़ा दें। खरपतवार नियंत्रण के लिए खुर्पी या कुदाल से गुड़ाई करने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।
  • सहारा (Staking): टमाटर की असीमित बढ़वार वाली प्रजातियों में सहारा (स्टेकिंग) प्रदान करना आवश्यक है। सहारा न देने पर पौधों की वृद्धि और उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, और मिट्टी के संपर्क में आने से फल रोगों के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं।
  • मल्चिंग (Mulching): सूखे घास-फूस की पलवार अथवा पुआल (मल्च) पौधों के नीचे बिछाने से अच्छी बढ़वार के साथ-साथ खरपतवार का नियंत्रण भी हो जाता है।

5. पौध संरक्षण (झुलसा रोग)

झुलसा रोग (Blight Disease) की रोकथाम के लिए एकीकृत प्रबंधन आवश्यक है:

  1. बीज और फसल चक्र:
    • स्वस्थ बीजों का प्रयोग करें।
    • गैर सोलनेसी कुल के पौधों का उपयोग कर फसल चक्र अपनाएं।
  2. फफूंदनाशक छिड़काव (प्रति लीटर पानी): रोगों के लक्षण दिखने पर निम्नलिखित में से किसी एक का छिड़काव अवश्य करें:
    • मैंकोजेब 2 ग्राम
    • जिनेब 2 ग्राम
    • साइमोक्सानिल + मैंकोजेब 1.5-2 ग्राम
    • एजोक्सीस्ट्रॉबिन 1 ग्राम

🧄 लहसुन (Garlic), मूली (Radish), गाजर (Carrot) और फ्रेंचबीन (French Bean) प्रबंधन

दिसंबर माह में इन फसलों के लिए सही पोषण, सिंचाई और निराई-गुड़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

1. लहसुन (Garlic) प्रबंधन

लहसुन में दो बार नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग से गांठों का विकास बेहतर होता है:

  • निराई-गुड़ाई और सिंचाई: आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई तथा सिंचाई करते रहें।
  • प्रथम टॉप ड्रेसिंग: बुआई के 40 दिनों बाद 74 कि.ग्रा. यूरिया की दर से करें।
  • दूसरी टॉप ड्रेसिंग: बुआई के 60 दिनों बाद 74 कि.ग्रा. यूरिया की समान मात्रा की दूसरी टॉप ड्रेसिंग कर दें।
  • खरपतवार नियंत्रण: दो से तीन निराई खरपतवार नियंत्रण के लिए पर्याप्त हैं।

2. मूली (Radish) प्रबंधन

  • बुआई का समय: उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से जनवरी तक मूली की बुआई कर सकते हैं।
  • किस्में: यूरोपियन प्रजातियां जैसे- पूसा हिमानी, व्हाइट आइसकिल, रैपिड रेड, व्हाइट टिप्ड एवं स्कारलेट ग्लोब आदि।
  • बुआई विधि: बुआई के समय खेत में नमी अच्छी प्रकार से होनी चाहिए।
    • छोटी-छोटी समतल क्यारियों में या 30-45 सें.मी. की दूरी पर बनी मेड़ों पर बुआई करें।
  • पौधों की दूरी: बीज जमने के बाद पौधों की दूरी 6-7 सें.मी. रखें।
  • सिंचाई:
    • शरदकालीन फसल में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।
    • मेड़ों पर सिंचाई हमेशा आधी मेड़ करनी चाहिए, ताकि पूरी मेड़ भुरभुरी व नमीयुक्त बनी रहे।

3. गाजर (Carrot) प्रबंधन

  • बुआई का समय: गाजर की किस्मों की बुआई दिसंबर से फरवरी में कर सकते हैं।
  • किस्में: पूसा यमदग्नि, पूसा नयन ज्योति एवं नैन्ट्स।
  • फसल की तैयारी: यह बुआई के 75-80 दिनों बाद तैयार होती है।
  • औसत उपज: औसतन 200-250 क्विंटल/हैक्टर उपज देती है।

4. फ्रेंचबीन (French Bean) प्रबंधन

  • टॉप ड्रेसिंग: बुआई के लगभग 30 दिनों बाद} 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग करें।
  • सिंचाई:
    • पहली सिंचाई: फूल आने के ठीक पहले करनी चाहिए।
    • दूसरी सिंचाई: फली बनते समय करनी चाहिए।

🥬 पत्तेदार सब्जियों (Leafy Vegetables) का प्रबंधन

ये सब्जियां आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, सोडियम, पोटेशियम, रेशे तथा विटामिन ‘ए’ व ‘सी’ जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत हैं।

यहाँ पालक, मेथी, सरसों साग और धनिया के प्रबंधन को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है:

1. पालक (Spinach) एवं मेथी (Fenugreek)

पालक और मेथी दोनों ही बहु-कटाई वाली फसलें हैं, जिनमें प्रत्येक कटाई के बाद पोषण आवश्यक है:

  • टॉप ड्रेसिंग: पत्तियों की प्रत्येक कटाई के बाद प्रति हैक्टर 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग करें।
  • सिंचाई: टॉप ड्रेसिंग के बाद सिंचाई अवश्य करें।

2. सरसों साग (Mustard Greens)

  • किस्म: सरसों की किस्म पूसा साग-1 उपयुक्त है।
  • पहली कटाई: पहली कटाई बुआई के 35 दिनों बाद शुरू हो जाती है।
  • कटाई की अवधि: इसकी कटाई जनवरी के आखिर तक की जा सकती है।

3. धनिया (Coriander)

धनिया में बढ़वार के चरण के अनुसार दो बार नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग आवश्यक है:

  • पहली टॉप ड्रेसिंग: जब धनिया के पौधे 3-4 सें.मी. के हो जाएँ, तो प्रति हैक्टर 15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग कर दें।
  • दूसरी टॉप ड्रेसिंग: 15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की दूसरी टॉप ड्रेसिंग पहली टॉप ड्रेसिंग के 20-25 दिनों बाद करें।

🟢 सब्जी मटर (Vegetable Pea) प्रबंधन

दिसंबर माह में सब्जी मटर के लिए फूल आने और फली बनने की क्रांतिक अवस्थाओं में प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

1. जल प्रबंधन एवं पोषण

  • पहली सिंचाई:फूल आने के समय आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई कर दें।
    • टॉप ड्रेसिंग: पहली सिंचाई के बाद 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन टॉप ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करें।
  • दूसरी सिंचाई: फलियाँ बनते समय दूसरी सिंचाई करनी चाहिए।
  • सिंचाई विधि: अधिक मात्रा में पानी लगाने से पौधों में श्वसन क्रिया प्रभावित होती है। इस प्रकार फुहारा विधि (Sprinkler Irrigation) से सिंचाई ज्यादा लाभप्रद होती है और पानी की बचत होती है।

2. खरपतवार नियंत्रण

  • यांत्रिक विधि: सब्जी मटर के लिए 1-2 निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है।
  • रासायनिक नियंत्रण:
    • दवा का नाम: पेण्डीमेथिलीन
    • मात्रा: 3.0 लीटर को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
    • सावधानी: खरपतवारनाशी का प्रयोग करते समय मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी होनी चाहिए।

3. तुड़ाई (Harvesting)

  • समय: फलियों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय की जानी चाहिए।
  • अंतराल: सामान्यतः लगभग 12-15 दिनों के अंतर पर कुल 3-4 तुड़ाई की जाती हैं।

4. पौध संरक्षण: चूर्णिल आसिता (Powdery Mildew)

चूर्णिल आसिता रोग की रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्म का चयन करना लाभदायक होता है।

उपचार विधिदवा का नाममात्राअंतराल
रासायनिक छिड़कावकेलिक्सीन0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव
रासायनिक छिड़कावपेन्कोनाजोल1 मि.ली. प्रति 4 लीटर पानी10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव
रासायनिक छिड़कावफ्लूसिलाजोल1 मि.ली. प्रति लीटर पानीआवश्यकतानुसार छिड़काव
सल्फर आधारितघुलनशील गंधक का चूर्ण3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से।एक हैक्टर खेत में लगभग 600-800 लीटर पानी की आवश्यकता।

🧅 प्याज फसल प्रबंधन: रोपाई एवं खरपतवार नियंत्रण

प्याज की रबी मौसम की फसल के लिए दिसंबर अंत और जनवरी की शुरुआत रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त समय है।

1. रोपाई का समय एवं किस्में

पैरामीटरविवरण
रोपाई का समयदिसंबर के अंत से 15 जनवरी तक रोपाई करनी चाहिए।
पौध की आयुरोपाई के लिए 7-8 सप्ताह पुरानी पौध का प्रयोग करें।
प्रमुख किस्मेंरबी मौसम के लिए: पूसा व्हाइट राउंड, पूसा माधवी, व्हाइट फ्लैट, पूसा रेड, अर्ली ग्रेनो, पूसा रतनार, एन-2-4-1, एग्रीफाउंड लाइट रेड।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए: ब्राउन स्पैनिश और अर्ली ग्रेनो।

2. रोपाई की दूरी

अच्छी उपज और गांठ के सही विकास के लिए रोपाई की सही दूरी बनाए रखना आवश्यक है:

  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी: 15 सें.मी.
  • पौध से पौध की दूरी: 10 सें.मी.

3. खरपतवार नियंत्रण

प्याज की फसल में खरपतवार एक गंभीर समस्या है। रासायनिक नियंत्रण के लिए:

  • दवा का नाम: पेण्डीमेथिलीन
  • मात्रा: 3.5 लीटर प्रति हैक्टर
  • पानी की मात्रा: 800-1000 लीटर पानी में घोलकर।
  • छिड़काव का समय: रोपाई के दो-तीन दिनों बाद, सिंचाई से पहले छिड़काव करें।

🥭 बागवानी फसल प्रबंधन: दिसंबर माह के कार्य

दिसंबर में फलों के बागानों को पाले से बचाना, कीटों का नियंत्रण करना और सही समय पर पोषण देना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दिसंबर माह में बागवानी फसलों (Horticultural Crops), जैसे आम, अमरूद, बेर, आँवला, अनार, पपीता, और लीची के लिए महत्वपूर्ण प्रबंधन कार्यों, विशेष रूप से पोषण, कीट/रोग नियंत्रण, और पाला प्रबंधन पर यहाँ इस जानकारी को व्यवस्थित और कार्य-आधारित प्रारूप में प्रस्तुत किया गया है:

1. आम (Mango)

प्रबंधन कार्यविवरण
परागणउत्तम परागण के लिए मधुमक्खी पालन के बक्सों को बागानों में लगाना चाहिए।
सिंचाई एवं सफाईआवश्यकतानुसार नियमित सिंचाई करें और बागों की साफ-सफाई करें।
पोषक तत्व10 वर्ष या इससे ज्यादा उम्र के वृक्षों में प्रति वृक्ष 750 ग्राम फॉस्फोरस और 1 कि.ग्रा. पोटाश थालों में दें।
मिलीबग/गुंजिया कीटयांत्रिक नियंत्रण: तने के चारों ओर 2 फीट की ऊँचाई पर 400 गेज वाली 30 सें.मी. पॉलीथीन की शीट की पट्टी बांधें।
रासायनिक नियंत्रणऐसे वृक्षों पर कार्बो सल्फॉन (0.05 प्रतिशत) अथवा डाइमेथोएट (0.05 प्रतिशत) का एक छिड़काव अवश्य करें।
पट्टी की सफाईबंधी गई एल्काथेन की पट्टियों को नियमित अंतराल पर साफ करते रहें, ताकि धूल जमा न हो।

2. अमरूद (Guava)

  • तुड़ाई एवं विपणन: सिंचाई प्रबंधन के साथ-साथ तैयार फलों को सही समय पर तुड़ाई कर बाजार में भेजने की व्यवस्था करें या प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के लिए उपयोग करें।
  • फल-मक्खी नियंत्रण:
    • रासायनिक: साइपरमेथ्रिन (2.0 मि.ली./लीटर) या मोनोक्रोटोफॉस (1.5 मि.ली./लीटर) की दर से घोल बनाकर फल परिपक्वता के पूर्व 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें।
    • यांत्रिक: प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा बगीचे में फेरोमोन ट्रैप लगाने चाहिए।

3. बेर (Ber)

  • फल गिरने से रोकना: छोटे फलों को गिरने से रोकने के लिए सुपरफिक्स हार्मोन (1.1 मि.ली. प्रति 4.5 लीटर पानी की दर से) घोलकर छिड़काव करें।

4. आंवला (Amla)

  • सिंचाई एवं विपणन: आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें व फलों की तुड़ाई एवं विपणन की व्यवस्था करें।
  • रोग नियंत्रण (भंडारण पूर्व): तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटॉन (0.15 प्रतिशत), डाइथेन एम-45 या बाविस्टीन (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करके भंडारित करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है।

5. अनार (Pomegranate)

  • पोषक तत्व (अम्बे बहार): अम्बे बहार अनार के लिए प्रति वृक्ष प्रति वर्ष प्रयोग करना चाहिए:
    • नाइट्रोजन: 600-700 ग्राम
    • फॉस्फोरस: 200-250 ग्राम
    • पोटाश: 200-250 ग्राम

6. पपीता (Papaya)

  • पोषक तत्व: वृक्षारोपण के 6 महीने के बाद प्रति पौधा निम्नलिखित उर्वरकों का प्रयोग करें।
    • नाइट्रोजन: 150-200 ग्राम
    • फॉस्फोरस: 200-250 ग्राम
    • पोटेशियम: 100-150 ग्राम
  • प्रयोग विधि: तीनों उर्वरकों को 2-3 खुराकों में (वृक्ष लगाने से पहले, फूल आने के समय तथा फल लगने के समय) दे देनी चाहिए।

7. लीची (Litchi)

अ. पाला प्रबंधन (Frost Management)

  • संवेदनशीलता: लीची के पौधे पाले के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं।
  • नए बागानों में: पाला प्रबंधन शुरू की अवस्था (नए बागानों) में अधिक जरूरी होता है।
    • ढकना: सिंचाई के साथ-साथ, घास-फूस अथवा फसल अवशेष या पॉलीथीन से नए छोटे पौधों को ढककर रखना चाहिए।
    • रासायनिक: पाले से बचने के लिए सल्फरयुक्त रसायन जैसे डाइमिथाइल सल्फो ऑक्साइड (0.2 प्रतिशत) अथवा 0.1 प्रतिशत थायो यूरिया}$ का छिड़काव लाभप्रद होता है।

ब. मिलीबग नियंत्रण

मिलीबग कड़ी कीट के नियंत्रण के लिए:

  1. बुरकाव: प्रति वृक्ष 200-250 ग्राम मिथाइल पैराथियॉन का बुरकाव वृक्ष के 1 मीटर के घेरे में कर दें।
  2. बैंडिंग: तने पर जमीन से 30-40 सें.मी. की ऊँचाई पर 400 गेज मोटाई वाली 30 सें.मी. चौड़ी एल्काथीन की पट्टी कसकर बांध दें।
  3. सील करना: पट्टी के दोनों सिरों पर गीली मिट्टी या ग्रीस से लेप कर दें, ताकि मिलीबग नीचे से ऊपर वृक्ष पर न चढ़ पाए।

स. मंजर एवं फूल प्रबंधन

  • छिड़काव: मंजरी आने के 30 दिनों पहले पौधों पर जिंक सल्फेट (2 ग्राम प्रति लीटर घोल) का पहला एवं 15 दिनों बाद दूसरा छिड़काव करने से मंजर एवं फूल अच्छे होते हैं।
  • अंतरफसली: पुराने बागों में अंतरफसली के रूप में हल्दी व अदरक की फसल लगाएं व आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।

🌹 सुगंधित पौधों (Aromatic Plants) और पुष्पीय पौधों (Flowering Plants) का प्रबंधन

दिसंबर माह में सुगंधित और फूलदार पौधों में कटाई-छँटाई, कीट-रोग नियंत्रण और गुणवत्ता सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

1. देसी गुलाब (Rose)

  • मुख्य कार्य: देसी गुलाब में आँख बडिंग (Eye Budding) और सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई करें।

2. रजनीगंधा (Tuberose)

  • मुख्य कार्य: अंतिम बहार की कटाई-छंटाई, पैकिंग एवं विपणन करें।
  • आय बढ़ाना: बाजार मांग के आधार पर लम्बी पुष्प दण्डिका या उच्च गुणवत्ता के पुष्पों का उत्पादन करके अधिक आय बढ़ाई जा सकती है।
  • बुआई (सर्दियों में उगने वाले): सर्दियों में उगने वाले पुष्पीय पौधों के लिए सितंबर-अक्टूबर में बीजारोपण करें।

3. ग्लैडियोलस (Gladiolus)

ग्लैडियोलस की अच्छी गुणवत्ता के लिए पोषण, सफाई और पौध संरक्षण आवश्यक है:

कार्यविवरण/उपचार
सामान्य प्रबंधनआवश्यकतानुसार सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई करें।
पौधे की सफाईमुरझाई टहनियों को निकालते रहें और बीज न बनने दें (ताकि पौधे की ऊर्जा फूल उत्पादन पर केंद्रित रहे)।
काला धब्बा रोगरोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत कैप्टॉन का घोल बनाकर छिड़काव करें।
चौफर कीट से बचावखेत की तैयारी के समय 20-25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर **थीमेट 10 जी या कार्बोफ्यूरॉन के ग्रेन्युलस मिट्टी में मिला लें।
चंपा एवं थ्रिप्सप्रकोप होने पर 0.2 प्रतिशत मेटासिड- 50 दवा का घोल बनाकर छिड़काव करें।

4. नर्गिस (Narcissus)

  • विशेषता: नर्गिस का फूल सर्दियों में उगने वाला खुशबूदार कंदीय फूल है।

🐄 पशुपालन/दुग्ध विकास (Animal Husbandry/Dairy Development)

ठंड के मौसम में पशुओं की देखभाल और पोषण पर विशेष ध्यान दें:

  • ठंड से बचाव: पशुओं को ठंड से बचाए रखें (आवश्यकतानुसार शेड को कवर करें या गर्म रखें)।
  • पोषण: हरे चारे के साथ-साथ दाना भी पर्याप्त मात्रा में दें, जिससे उनके शरीर में ऊर्जा बनी रहे।
  • कृमि नियंत्रण: पशुओं में जिगर के कीड़ों (लीवर फ्लूक) की रोकथाम के लिए कृमिनाशक (Dewormer) पिलाएँ।

🐔 मुर्गीपालन (Poultry Farming)

अंडा उत्पादन और चूजों के स्वास्थ्य के लिए विशेष देखभाल की आवश्यकता है:

  • पोषण:
    • अंडा देने वाली मुर्गियों को लेयर फीड दें।
    • सीप का चूरा भी दें (यह कैल्शियम प्रदान करता है, जो अंडे के छिलके के लिए आवश्यक है)।
    • बरसीम का हरा चारा भी थोड़ी मात्रा में दे सकते हैं।
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