हरित क्रांति का जहरीला सच: खेती में ज़हर का कारोबार और आपकी सेहत पर असर

💀 मौत का व्यापार: हरित क्रांति का जहरीला सच
यह लेख भारत और दुनिया में चल रहे ‘मौत के व्यापार’ की गंभीरता पर प्रकाश डालता है, जहाँ कृषि के नाम पर खतरनाक कीटनाशक, जंतुनाशक और रासायनिक खादों का उपयोग किया जा रहा है।
1. हरित क्रांति: एक ज़हरीली शुरुआत
सन 1960 के दशक में भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) की शुरुआत हुई। इसका मुख्य प्रचार यह था कि अन्न का उत्पादन बढ़ाना है और फसल को कीटों से बचाना है।
- पारंपरिक कृषि: 1960 से पहले, भारत का किसान धरती को माँ मानता था और मिट्टी में किसी भी तरह का रासायनिक जहर (पेस्टिसाइड, इंसेक्टिसाइड, यूरिया, डीएपी) नहीं डालता था। कृषि को एक आध्यात्मिक कर्म माना जाता था।
- किसानों को बहकाना: हरित क्रांति के नाम पर किसानों से कहा गया कि अगर वे यूरिया और कीटनाशक नहीं डालेंगे, तो खेती चौपट हो जाएगी और सारा देश भूखा मरेगा।
- शुरुआत: शुरुआत में रासायनिक खादें मुफ्त में दी गईं, जिससे मिट्टी को इसकी आदत पड़ गई। धीरे-धीरे किसानों ने इसे खरीदना शुरू कर दिया।
2. भारतीय खेतों में जहर की मात्रा
आज स्थिति यह है कि लाखों मीट्रिक टन जहरीली खादें और कीटनाशक खेतों में डाले जा रहे हैं।
| वस्तु | मात्रा (प्रति वर्ष) | विवरण |
| रासायनिक खाद (जहर) | 1 करोड़ 90 लाख मीट्रिक टन | यूरिया, डीएपी, सिंगल सुपर फॉस्फेट आदि के नाम पर। |
| कीटनाशक/जंतुनाशक | 90,000 मीट्रिक टन (पाउडर) + 1 करोड़ लीटर (द्रव्य) | लिंडेन, क्लोरो पाइरीफॉस, मोनोक्रोटोफॉस आदि 786 किस्म के कीटनाशक और 215 किस्म के जंतुनाशक। |
- पौधों की कमजोरी: रासायनिक खाद डालने से पौधों की प्रतिरक्षा शक्ति (Immunity) कम हो जाती है, जैसे मनुष्य का शरीर बीमार पड़ने लगता है।
- जहर का दुष्चक्र: पहले खाद डालकर पौधों को कमजोर किया जाता है, फिर उन पर लगने वाले कीड़े-मकोड़ों को मारने के लिए और अधिक जहर स्प्रे किया जाता है।
3. आपके शरीर में आता जहर 🍽️
शोध बताते हैं कि इन जहरीले रसायनों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही पौधों के काम आता है, बाकी सब अंततः हमारे शरीर में पहुँच जाता है:
- रासायनिक खाद: इसका केवल 8 से 9 प्रतिशत ही काम आता है। बाकी जहर मिट्टी से होते हुए फल और फिर भोजन के माध्यम से आपके शरीर में आ जाता है।
- कीटनाशक/जंतुनाशक: इनका सिर्फ 3 से 4 प्रतिशत ही उपयोग हो पाता है। बाकी 96 प्रतिशत जहर मिट्टी, फल और भोजन के रास्ते हमारे शरीर में आता है।
- औसत सेवन: एक अनुमान के अनुसार, भारत का हर व्यक्ति हर साल लगभग 200 मिलीग्राम कीटनाशक और जंतुनाशक जहर भोजन के रूप में अपने शरीर में खा जाता है।
4. किसानों की प्रत्यक्ष मौतें: स्प्रे करते 76,000 किसान
यह जहर सिर्फ परोक्ष रूप से ही नहीं मार रहा है, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से भी हर साल हज़ारों किसानों की जान ले रहा है।
- सीधी मौत: कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, हर साल 76,000 किसान कीटनाशकों का छिड़काव (स्प्रे) करते समय मर जाते हैं।
- मृत्यु का कारण: स्प्रे करते समय यह जहर हवा में घुलता है और श्वास के द्वारा शरीर में चला जाता है।
- उपचार का अभाव: इन जहरों को शरीर से बाहर निकालने के लिए अच्छी दवाएँ उपलब्ध नहीं हैं। ज्यादातर किसान डॉक्टर के पास पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं या कुछ दिन संघर्ष करके हॉस्पिटल में मर जाते हैं।
5. कैंसर का सबसे बड़ा कारण 🩺
विशेषज्ञों के शोध बताते हैं कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का सबसे बड़ा कारण यही जहरीले कीटनाशक और रासायनिक खाद हैं।
- गंभीर बीमारियाँ: यह जहर कैंसर, डायबिटीज, हृदयाघात, पैरालिसिस और ब्रेन हेमरेज जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनता है।
- विशेषज्ञों की राय: कैंसर पर काम करने वाले सभी वरिष्ठ चिकित्सक और वैज्ञानिक यह मानते हैं कि भारत और दुनिया में कैंसर का सबसे बड़ा कारण खेतों में डाले जा रहे जहरीले रसायन ही हैं।
6. भारत में जहर के हॉटस्पॉट: बठिंडा की ‘कैंसर स्पेशल ट्रेन’
भारत के 17-18 राज्य ऐसे हैं जहाँ सबसे ज्यादा जहर खेतों में डाला जा रहा है। इनमें पंजाब शीर्ष पर है।
- पंजाब में जहर की मात्रा: पंजाब में प्रति एकड़ हर साल 113 किलोग्राम रासायनिक खाद डाली जाती है।
- बठिंडा: पूरे भारत के 680 जिलों में बठिंडा वह जिला है, जहाँ प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा कैंसर के मरीज हैं।
- कैंसर स्पेशल ट्रेन: बठिंडा से राजस्थान के बीकानेर (जहाँ कैंसर का इलाज होता है) के लिए हर दिन एक ट्रेन जाती है, जिसे लोग ‘कैंसर स्पेशल ट्रेन’ कहने लगे हैं। इस ट्रेन में भरकर हर दिन हजारों कैंसर के मरीज यात्रा करते हैं।
- अन्य जिले: जालंधर और होशियारपुर (पंजाब) तथा हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले भी इस समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित हैं।
यह कृषि के नाम पर चल रहा एक बहुत बड़ा मौत का व्यापार है, जिसमें हजारों किसान प्रत्यक्ष रूप से और लाखों लोग परोक्ष रूप से मारे जा रहे हैं।
7. कौन चला रहा है ‘मौत का व्यापार’ और क्यों? 💰
इस ज़हरीले व्यापार में दुनिया के लगभग 24 देशों की एक हज़ार से अधिक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) लगी हुई हैं। इनमें अमेरिका, जर्मनी, जापान, फ्रांस, चीन जैसे देशों की कंपनियाँ शामिल हैं, जिनका भारत की कुछ कंपनियों के साथ गठजोड़ (Collaboration) है।
कंपनियों को लाभ:
- भारी मुनाफा: ये कंपनियाँ इस व्यापार से सालाना लगभग 5 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रही हैं। यह सारा पैसा किसानों की जेब से निकलकर विदेशी कंपनियों की तिजोरियों में जा रहा है।
- झूठा तर्क: ये कंपनियाँ यह कुतर्क देती हैं कि अगर वे कीटनाशक नहीं बेचेंगी, तो भारत में फसल चौपट हो जाएगी और देश भूखा मरेगा।
षड्यंत्र का खुलासा (The Conspiracy):
भारत सरकार के ही आँकड़े बताते हैं कि यदि खेतों में कोई भी जहर न डाला जाए, तो भी अधिकतम ₹1,500 करोड़ रुपये की ही फसल बर्बाद होती है।
निष्कर्ष: कंपनियाँ ₹1,500 करोड़ की फसल को बचाने के नाम पर ₹5 लाख करोड़ का व्यापार करती हैं। यह स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य फसल बचाना नहीं, बल्कि जहर का व्यापार चलाना और मुनाफा कमाना है।
8. प्रतिबंधित जहर का भारत में धड़ल्ले से कारोबार (The Endosulfan Game) 🛑
यह व्यापार एक गहरे षड्यंत्र की ओर इशारा करता है, जब हम उन कीटनाशकों पर ध्यान देते हैं जिन्हें अमीर देशों ने खुद प्रतिबंधित कर दिया है:
| कीटनाशक | स्थिति | प्रभाव |
| एंडोसल्फान (Endosulfan) | अमेरिका, जापान और 56 से अधिक देशों में 20 साल पहले प्रतिबंधित। | वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी एक बूँद कैंसर पैदा करने के लिए पर्याप्त है। यह सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) और बच्चों में जेनेटिक डिसऑर्डर (Genetic Disorders) का बड़ा कारण है। |
- धोखा: जिन देशों (अमेरिका, जापान, यूरोप) में एंडोसल्फान बनाना और बेचना बंद है, उन्हीं देशों की कंपनियाँ भारत में आकर इसे बनाती और बेचती हैं।
- दोहरी साजिश:
- पहले एंडोसल्फान जैसे जहर को भारत में बेचकर कैंसर पैदा किया जाए, और ₹5 लाख करोड़ का मुनाफा कमाया जाए।
- फिर उसी कैंसर के इलाज के नाम पर महँगी पेटेंटेड दवाएँ बेचकर और लाखों करोड़ रुपये कमाया जाए।
💊 दवा लॉबी का नियंत्रण और पेटेंट का खेल
भारत में कैंसर सहित कई जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता और कीमतों पर यूरोपीय और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों (MNCs) का गहरा नियंत्रण है। यह नियंत्रण मुख्य रूप से पेटेंट (Patent) कानून के माध्यम से स्थापित होता है, जो दवा के बाज़ार और उसकी कीमत को सीधे प्रभावित करता है।
पेटेंट और ऊँची कीमतें 📈
- पेटेंट क्या है? पेटेंट एक कानूनी अधिकार है जो किसी कंपनी को एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 20 साल) के लिए उसकी नई दवा को बनाने, इस्तेमाल करने और बेचने का एकमात्र अधिकार देता है।
- कीमतों पर असर: जब तक दवा पर पेटेंट रहता है, तब तक उस दवा का कोई अन्य निर्माता या भारतीय कंपनी उसका जेनेरिक संस्करण (Generic Version) नहीं बना सकती। इस एकाधिकार (Monopoly) के कारण, पेटेंट धारक कंपनी दवा की कीमत अपनी मर्जी से बहुत ऊँची रखती है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज़ों के लिए इलाज कराना असंभव हो जाता है।
- कैंसर की दवाएँ: कैंसर के इलाज में उपयोग होने वाली अधिकांश उन्नत और नई दवाएँ इसी श्रेणी में आती हैं।
लॉबिंग और नीतिगत नियंत्रण (The Lobbying Power)
यह दवा लॉबी भारत सरकार की स्वास्थ्य और व्यापार नीतियों को प्रभावित करने के लिए भारी दबाव डालती है।
- सरकारी प्रयास असफल: पूर्व में भारत सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाएँ सस्ती करने के लिए कई बार प्रयास किए हैं।
- मांग: इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य था कि या तो पेटेंट वाली दवाओं का मूल्य नियंत्रण (Price Control) किया जाए, या फिर विशिष्ट परिस्थितियों में पेटेंट को समाप्त (Off-Patent) करके भारतीय कंपनियों को सस्ती जेनेरिक दवाएँ बनाने की अनुमति दी जाए।
- लॉबी का प्रभाव: दुर्भाग्य से, दवा लॉबी इतनी मजबूत और संगठित है कि उसने इन सुधारों को लागू नहीं होने दिया। ये कंपनियाँ वैश्विक व्यापार समझौतों और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का सहारा लेकर सरकार पर इतना दबाव बनाती हैं कि देश के स्वास्थ्य मंत्रालय को इन कंपनियों के व्यावसायिक हितों के सामने झुकना पड़ जाता है।
- षड्यंत्र का दोहरा चक्र: जैसा कि आपके पिछले लेखों में बताया गया है, यह नियंत्रण एक दुष्चक्र का हिस्सा है। पहले ये कंपनियाँ ज़हरीले कृषि रसायन बेचकर बीमारियाँ (कैंसर) पैदा करती हैं, और फिर उन्हीं बीमारियों के इलाज के लिए महँगी पेटेंटेड दवाएँ बेचकर दोहरा मुनाफा कमाती हैं।
समाधान: कंपल्सरी लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing)
इस समस्या से निपटने के लिए भारत के पास पेटेंट अधिनियम, 1970 में एक प्रावधान है, जिसे ‘कम्पल्सरी लाइसेंसिंग’ (Compulsory Licensing – अनिवार्य लाइसेंस) कहते हैं।
- उद्देश्य: यह प्रावधान सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल या सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में, पेटेंट धारक की सहमति के बिना भी, किसी भारतीय कंपनी को वह दवा बनाने की अनुमति देने का अधिकार देता है।
- उपयोग: भारत ने अतीत में कुछ पेटेंटेड कैंसर दवाओं के लिए इसका उपयोग किया है, जिससे उन दवाओं की कीमत 90% तक कम हो गई थी।
- चुनौती: दवा लॉबी इस प्रावधान का उपयोग होने से रोकने के लिए लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाए रखती है, जिससे सरकारें इसका व्यापक उपयोग करने से हिचकती हैं।
इस प्रकार, रासायनिक कृषि से ज़हर फैलाकर कैंसर पैदा करना और फिर महंगी दवाओं के माध्यम से लाभ कमाना, एक संगठित ज़हर के कारोबार को जन्म देता है।
9. भोजन के रूप में शरीर में जहर की घुसपैठ 🤢
हम सब्जियों और फलों के माध्यम से हर दिन जहर खाते हैं। उदाहरण के लिए, बाज़ार से खरीदे गए अंगूरों पर चिपका सफ़ेद पाउडर साधारण पानी से धोने पर नहीं छूटता, क्योंकि वह ऑक्सैलिक एसिड का पाउडर होता है।
- जहर की मात्रा (सालाना औसत):
- यूरिया/डीएपी/सुपरफॉस्फेट: एक साधारण भारतीय लगभग 1.7 किलोग्राम रसायन खाता है।
- कीटनाशक (एंडोसल्फान, लिंडेन): लगभग 200 ग्राम खतरनाक जहर खाता है।
- कुल जहर: सालाना लगभग 2 किलोग्राम जहर हमारे शरीर में जा रहा है।
- अंगों पर प्रभाव: शरीर का तंत्र (Kidney, Liver) इस जहर को बाहर निकालने के लिए अतिरिक्त काम करता है और अंततः फेल हो जाता है। माताओं के दूध तक में एंडोसल्फान और एल्डिकार्ब जैसे जहर पाए गए हैं, जो बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
- वैश्विक विस्तार: यह ‘मौत का व्यापार’ केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि 150 से अधिक गरीब और विकासशील देशों में चल रहा है।
10. अमीर देशों का दोहरा चरित्र: भारत के विरुद्ध षड्यंत्र
यह साजिश इसलिए गहरी लगती है क्योंकि अमीर देशों की सरकारें अपने ही देश में जहर-मुक्त खेती को बढ़ावा देती हैं, जबकि उनकी कंपनियाँ भारत जैसे देशों में जहर बेचती हैं।
- विदेशों में प्रोत्साहन: अमेरिका और यूरोप में जो किसान अपने खेत में एक पैसे का भी जहर नहीं डालते, उनकी उपज सरकारें 400% तक सब्सिडी देकर खरीदती हैं। उन्हें जहर-मुक्त खेती के लिए ज्यादा पैसा मिलता है।
- भारत में विपरीत कार्य: वहीं, उन्हीं देशों की कंपनियाँ भारत में आकर किसानों को जहर युक्त खेती करने के लिए मजबूर करती हैं, जिससे भारतवासियों के खून में जहर आने लगा है।
- युद्ध के रसायन से कृषि रसायन: दूसरे विश्व युद्ध (1945) के बाद, हथियार बनाने वाली यूरोप और अमेरिका की कंपनियों के सामने संकट आया। उन्होंने षड्यंत्र के तहत उन्हीं रासायनिक हथियारों (Chemical Weapons) में उपयोग होने वाले मूल रसायनों से यूरिया, डीएपी और कीटनाशक बनाकर दुनिया भर में बेचना शुरू कर दिया।
11. समाधान: आम लोगों की भूमिका और मांग की शक्ति 💪
इस ज़हर के कारोबार को बंद करने का सबसे अच्छा और एकमात्र रास्ता है बाज़ार में ‘विष मुक्त’ भोजन की मांग पैदा करना। यह क्रांति किसी सरकार या कंपनी से शुरू नहीं होगी, बल्कि आप और हम जैसे आम लोगों से शुरू होगी।
आपकी (आम नागरिक की) महत्वपूर्ण भूमिका
आपकी क्रय शक्ति (Buying Power) इस षड्यंत्र को खत्म करने की सबसे बड़ी ताकत है:
- चेतना जगाना: जब आप किसी बीमार व्यक्ति से मिलें या अपने परिवार में चर्चा करें, तो उन्हें विनम्रतापूर्वक समझाएँ कि गंभीर बीमारियों का एक बड़ा कारण वह ज़हर है जो वे रोज़ाना भोजन के रूप में खा रहे हैं।
- मांग पैदा करना: अपने सब्जी विक्रेता, फल विक्रेता और राशन बेचने वाले से साफ शब्दों में कहें कि आपको ‘ज़हर मुक्त खाना’ चाहिए। आप यह मांग करें कि आपको ‘विष मुक्त सब्ज़ियाँ, फल और अनाज’ ही चाहिए।
- बाज़ार बदलना: अर्थशास्त्र का सामान्य सिद्धांत है: मांग (Demand) पहले होती है, आपूर्ति (Supply) उसके पीछे आती है। जब बाज़ार में विष-मुक्त अनाज की मांग बड़ी संख्या में पैदा होगी, तो किसान मजबूर होकर गाय के गोबर से ज़हर मुक्त खेती करने लगेंगे।
- शुरुआत में कीमत: हो सकता है शुरुआत में ज़हर मुक्त भोजन थोड़ा महंगा बिके, लेकिन जैसे-जैसे ज़्यादा लोग मांग करेंगे और उत्पादन बढ़ेगा, कीमतें अपने आप कम होती जाएँगी।
आपकी एक छोटी सी मांग इस बड़े ज़हर के कारोबार को बंद कराने में सहायक होगी। इससे कंपनियों का बाज़ार खत्म होगा और हम सब कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचने का रास्ता खोल पाएँगे।
12. बिना जहर के भी अधिक उत्पादन संभव (Myth Buster) ✅
यह दावा कि “उत्पादन सिर्फ यूरिया और डीएपी से ही बढ़ सकता है” पिछले चालीस-पैंतालीस साल से फैलाया गया सबसे बड़ा झूठ है।
जैविक खेती से बढ़ा हुआ उत्पादन
पिछले पंद्रह सालों में भारत में हजारों जागरूक किसानों ने बीस लाख एकड़ ज़मीन पर बिना यूरिया और डीएपी के खेती की है। उनका अनुभव सिद्ध करता है:
| फसल | रासायनिक खाद से उत्पादन | जैविक खेती से उत्पादन | वृद्धि |
| गन्ना | 30 मीट्रिक टन/एकड़ | 90 मीट्रिक टन/एकड़ | तीन गुना |
| गेहूं | 15-20 क्विंटल/एकड़ | 25-30 क्विंटल/एकड़ | दोगुना |
| कपास | 2-2.5 क्विंटल/एकड़ | 7 क्विंटल/एकड़ | तीन गुना |
अंतिम निष्कर्ष: युद्ध के हथियार बने कृषि जहर (The Final Truth)
यह सबसे बड़ा झूठ है जो पिछले चालीस-पैंतालीस साल इस देश में फैलाया गया कि उत्पादन सिर्फ यूरिया और डीएपी से ही बढ़ सकता है।
- उत्पादन का झूठ: दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक कभी भी ये रासायनिक जहर न बने थे और न ही खेतों में डाले गए थे।
- युद्ध के बाद का संकट: 1945 में जब द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हुआ, तो यूरोप और अमेरिका की उन कंपनियों के सामने संकट खड़ा हो गया, जो ज़हरीले रासायनिक हथियार बनाती थीं। युद्ध रुकने से उनका हथियार बेचने का रास्ता बंद हो गया।
- षड्यंत्र का जन्म: कंपनियों ने तब यह रास्ता निकाला कि जिन कारखानों में हथियार बनते थे, उन्हीं रसायनों से यूरिया, डीएपी, एल्डीकार्ब और लिंडेन जैसे जहरीले पदार्थ बनाए जाएँ और किसानों के माध्यम से पूरी दुनिया में बेचा जाए।
- मूल रसायन एक: यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि जिन रसायनों से युद्ध लड़ने के लिए रासायनिक हथियार (केमिकल बॉम्ब/गैस) बनते हैं, उन्हीं मूल रसायनों से खेतों को बर्बाद करने के लिए यूरिया, डीएपी और कीटनाशक बनते हैं।
यह एक बहुत बड़ा षड्यंत्र था, जिसे किसानों को मूर्ख बनाकर और झूठ बोलकर पूरी दुनिया में फैलाया गया। अब हमें यह बात समझ में आ गई है, तो हमारा कर्तव्य है कि हम इस मौत के व्यापार को पहले अपनी धरती से, फिर पड़ोसी देशों की धरती से, और अंततः पूरी दुनिया की धरती से बंद कराएँ, ताकि गरीब से गरीब इंसान को भी सम्मान और स्वास्थ्य के साथ जीने का अधिकार मिल सके।
