🚫 रासायनिक खाद और कीटनाशक क्यों बंद करें? और 🐄 गोबर की खाद ही क्यों अपनाएँ? (Stop Chemical Fertilizers and Pesticides And Why Use Cow Dung Manure?)

No Chemical & Fertilizers

रासायनिक खेती छोड़ें और अपनाएं गोबर की खाद: जानिए क्यों और कैसे? 🌿

हमारे गांवों में विदेशी कंपनियों की सबसे ज्यादा बिकने वाली जो चीज है, वह है रासायनिक खाद और कीटनाशक (यूरिया, डीएपी, एंडोसल्फान, आदि)। यह किसानों के बीच सबसे ज्यादा खरीदी जाती है। आंकड़ों के अनुसार, एक साल में करीब 4 लाख 80 हजार करोड़ रुपये की रासायनिक खाद और कीटनाशक खरीदे जाते हैं।

इसका सीधा मतलब है कि हमारे किसान हर साल इतनी बड़ी रकम विदेशी कंपनियों को दे रहे हैं। हमें इस पैसे को विदेश जाने से बचाना है और अपने किसानों को इस जहर से मुक्त करना है।

1. रासायनिक खेती: बढ़ता खर्च और कर्ज का जाल

किसानों को यह समझना होगा कि रासायनिक खाद बहुत महंगी पड़ती है।

  • कीमतों में उछाल: जो खाद पहले 70 रुपये में मिलती थी, आज वह 300 से 500 रुपये तक पहुंच गई है।
  • बढ़ती खपत: एक बार खेत में यूरिया डाल दिया, तो अगली बार मात्रा दुगनी करनी पड़ती है। यह चक्र चलता रहता है और खेती की लागत बढ़ती जाती है।
  • पानी की बर्बादी: रासायनिक खाद (यूरिया/डीएपी) बहुत गर्म होती है, जिससे मिट्टी चटक जाती है। इस कारण खेत को बार-बार पानी देना पड़ता है। जहाँ गोबर की खाद में 3 बार पानी लगता है, वहां यूरिया में 5-6 बार पानी लगाना पड़ता है। इससे भूजल स्तर (Water level) लगातार नीचे जा रहा है।

2. हमारी सेहत और माताओं पर मंडराता खतरा

यूरिया और डीएपी का नुकसान सिर्फ खेत तक सीमित नहीं है। यह केमिकल मिट्टी में घुलते हैं, फिर पौधे की जड़ में, फिर तने में और अंत में फल और अनाज में आते हैं।

  • यही जहरीला भोजन हम खाते हैं, जिससे कैंसर, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी 148 तरह की बीमारियां हो रही हैं।
  • यह जहर माताओं के दूध तक पहुंच चुका है। कई परीक्षणों में पाया गया है कि माताओं के दूध में वही कीटनाशक हैं जो यूरिया में होते हैं।
  • आज हम अनजाने में अपने ही बच्चों को भोजन के नाम पर जहर दे रहे हैं।

3. भ्रम और सच्चाई: क्या गोबर की खाद से उत्पादन कम होता है?

अक्सर किसान पूछते हैं कि “गोबर की खाद से उत्पादन नहीं होगा।” यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। सच्चाई यह है कि गोबर की खाद से यूरिया के मुकाबले ज्यादा उत्पादन होता है। गोबर की खाद में कैल्शियम, आयरन, सल्फर, कोबाल्ट, मैंगनीज जैसे 18 सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं, जो यूरिया-डीएपी में नहीं होते। खाद बनाने का खर्चा लगभग शून्य है, क्योंकि सामग्री घर पर ही उपलब्ध है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक के हजारों किसानों ने यह साबित किया है:

  • गन्ने की खेती में जहां यूरिया से 20-25 मीट्रिक टन उत्पादन होता था, गोबर की खाद से वह 90-100 मीट्रिक टन हो गया।
  • गेहूं का उत्पादन 12 क्विंटल से बढ़कर 20-22 क्विंटल हो गया।
  • कपास का उत्पादन 2.5 क्विंटल से बढ़कर 7 क्विंटल हो गया।

4. किसान का असली मित्र: केंचुआ (Earthworm)

गोबर की खाद का सबसे बड़ा वैज्ञानिक लाभ ‘केंचुए’ हैं।

  • यूरिया केंचुए का काल है: जब आप खेत में यूरिया डालते हैं, तो केंचुए तड़प कर मर जाते हैं। जबकि केंचुआ किसान का सबसे बड़ा दोस्त है।
  • प्राकृतिक ट्रैक्टर: केंचुआ दिन भर मिट्टी को नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे करता है। इससे मिट्टी नरम और छिद्रयुक्त (Porous) बनती है।
  • वाटर रिचार्जिंग: केंचुए द्वारा बनाए गए छिद्रों से बारिश का पानी जमीन के अंदर जाता है, जिससे जल स्तर बढ़ता है।
  • मुफ्त की जुताई: एक केंचुआ साल भर में 36 मीट्रिक टन मिट्टी को उलट-पुलट करता है। यही काम ट्रैक्टर से करने पर 100 लीटर डीजल जलेगा। यानी केंचुआ किसान के हजारों रुपये बचाता है।

गोबर, केंचुए का भोजन है। जब हम गोबर की खाद डालते हैं, तो केंचुओं की संख्या लाखों-करोड़ों में बढ़ जाती है। इससे मिट्टी उपजाऊ बनती है, पानी की बचत होती है और बाढ़ का खतरा कम होता है।

इसलिए, देश और समाज को बचाने के लिए हमें विदेशी रासायनिक खाद का त्याग कर गोबर की खाद को अपनाना ही होगा।

5. जीवाणु घोल (जीवामृत) बनाने की विधि 🌿🧪

यदि आप सही तरीके से जीवाणु घोल (जीवामृत) का उपयोग करते हैं, तो आपका उत्पादन एक ग्राम भी कम नहीं होगा। इसके लिए गोबर को सूखाकर नहीं, बल्कि पानी में घोलकर ‘ताज़ा’ और ‘गीला’ डालना चाहिए।

गोबर की खाद को तीन गुना अधिक फायदेमंद बनाने के लिए यह जीवाणु घोल (Microbial Solution) या जीवामृत बनाने का अचूक फॉर्मूला है:

सामग्री (Ingredients)मात्रा (1 एकड़ लगभग 2.5 बीघा फसल के लिए)स्रोत
1. गोबर (Dung)10 किलो (किसी भी जानवर का)घर का जानवर, देसी गाय का हो तो सर्वोत्तम।
2. मूत्र (Urine)10 लीटर (उसी जानवर का)पशुशाला में नाली बनाकर इकट्ठा करें। (कोई एक्सपायरी डेट नहीं)।
3. गुड़ (Jaggery)0.5 से 1 किलोसबसे घटिया, पुराना, काला गुड़।
4. दाल का आटा (Pulse Flour)1 किलो (अरहर/मूंग/चना/सोयाबीन/खेसरी)कोई भी दाल का आटा।
5. मिट्टी (Soil)1 मुट्ठी (लगभग 1 किलो)पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे से खोदें, जहाँ जीवाणु सबसे ज्यादा होते हैं।

पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी क्यू? पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी सर्वोत्तम होती है, क्योंकि ये पेड़ हर समय अधिक ऑक्सीजन देते हैं, जिससे इनके नीचे जीवाणुओं की संख्या सबसे अधिक पाई जाती है। यही जीवाणु खेत को चाहिए।

6. जीवामृत बनाने और उपयोग करने का तरीका 💡

भाग A: घोल तैयार करना (Preparation)

  1. घोलना: 10 किलो गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 1 किलो गुड़, 1 किलो दाल का आटा और 1 मुट्ठी मिट्टी को एक प्लास्टिक या लोहे के ड्रम में मिला लें।
  2. पानी: घोलने में आसानी हो, इसलिए थोड़ा पानी मिला सकते हैं।
  3. संग्रहण: इसे कपड़े से ढककर छाँव में (धूप से दूर) 15 दिन के लिए रख दें।
  4. 💡 महत्वपूर्ण: 15 दिन में यह खाद तैयार हो जाएगा, जिसमें मिट्टी के 1 लाख जीवाणु 100 करोड़ से अधिक हो जाएंगे।

भाग B: खेत में डालने की विधि (Application)

  1. पतला करना: 15 दिन बाद इस जीवाणु घोल में 100 से 200 लीटर पानी मिलाएँ (गोबर की मात्रा का 10 से 20 गुना)।
  2. उपयोग का समय: यह घोल पौधों की जड़ों को वे सभी सूक्ष्म पोषक तत्व (जैसे कैल्शियम, आयरन, नाइट्रोजन) उपलब्ध कराता है, जो वास्तव में स्वस्थ फसल के लिए ज़रूरी हैं।
  3. डालने का समय-चक्र:
    • पहली बार: खेत की जुताई (बीज डालने से पहले) के एक-दो दिन बाद।
    • दूसरी बार: बीज बोने के ठीक 21वें दिन
    • उसके बाद: हर 21 दिन के अंतराल पर डालते रहें। (4 महीने की फसल में लगभग 5-6 बार)।

भाग C: छिड़काव के तरीके (Methods of Application)

खेत में जीवाणु घोल डालने के लिए 4 मुख्य विधियाँ हैं:

  1. छिड़काव: सीधे डब्बे से भरकर खेत में छिड़काव करना।
  2. पानी के साथ: खेत में पानी लगाते समय नाली में एक टंकी से टपक-टपक कर पानी के साथ मिलाना (सबसे प्रभावी तरीका)।
  3. लड्डू विधि: गोबर को इसी घोल में मिलाकर लड्डू बनाकर खेत में फेंकना।
  4. स्प्रे मशीन: स्प्रे मशीन का नोजल निकालकर (फसल पर नहीं, मिट्टी पर) स्प्रे करना।

7. देसी गाय और गोमूत्र का महत्व 🐄

गोबर और गोमूत्र किसी भी जानवर का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन देसी गाय का गोबर सर्वोत्तम होता है।

  • देसी बनाम जर्सी: यदि आपके पास जर्सी गाय का गोबर है, तो उसमें देसी गाय का 1-2 किलो गोबर मिला लें। देसी गाय के जीवाणु जल्दी अपनी संख्या बढ़ा लेते हैं, और यह मिश्रण देसी की तरह ही काम करता है (जैसे दूध में दही का जामन)।
  • गोमूत्र की गुणवत्ता: जानवरों के मूत्र की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती, आप इसे सालों तक इकट्ठा करके इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • जर्सी गाय का दूध: दुनिया के कई देश जर्सी गाय का दूध नहीं पीते, क्योंकि यह कैंसर और घुटनों के दर्द जैसी बीमारियों को जन्म दे सकता है। इसलिए, देसी गायों को अपनाना न सिर्फ खेती के लिए, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है।

8. जैविक कीटनाशक बनाने की विधि: कीटों का प्राकृतिक इलाज 🐛🚫

जैविक खाद के प्रयोग के बाद भी अगर फसल पर कीट या कीड़े लगते हैं, तो हमें महंगे विदेशी कीटनाशकों पर पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। हम खुद प्राकृतिक और प्रभावी कीटनाशक दवा घर पर ही बना सकते हैं।

यह फॉर्मूला एक एकड़ खेत के लिए है:

सामग्री (Ingredients)मात्रा (Quantity)
जानवरों का पेशाब/गोमूत्र20 लीटर
नीम के पत्ते की चटनी2.5 – 3 किलो
आकड़े (Akanda) के पत्ते की चटनी2.5 – 3 किलो
बेशर्म (Besharam) के पत्ते की चटनी2.5 – 3 किलो
सीताफल (शरीफा) के पत्ते की चटनी2.5 – 3 किलो (यदि उपलब्ध हो)
तीखी लाल/हरी मिर्च250 – 300 ग्राम (पीसकर)
लहसुन (Garlic)लगभग आधा किलो (पीसकर)

💡 मोटी बात याद रखें: जिन-जिन पत्तों को गाय नहीं खाती, वे सब पत्ते पीसकर गोमूत्र में मिला दें।

दवा तैयार करने और छिड़काव का तरीका:

  1. उबालना: सभी सामग्री को 20 लीटर गोमूत्र में डालकर उबालें
  2. घोल बनाना: उबालने के बाद इसे ठंडा करें और इसमें 200 लीटर पानी मिला दें।
  3. छिड़काव: इस घोल को किसी भी फसल पर स्प्रे करें। यह 48 घंटे (दो से तीन दिन) में सारे कीटों को खत्म कर देता है।

9. स्वदेशी आंदोलन का व्यापक लाभ

यह जैविक और स्वदेशी मॉडल केवल किसानों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और स्वास्थ्य लाभ है।

बचत का क्षेत्रअनुमानित बचत
किसानों का पैसा (खाद/कीटनाशक)₹4,80,000 करोड़
शहर वालों का पैसा (स्वास्थ्य/दवाइयां)₹2,32,000 करोड़
कुल बचतकरीब ₹7-8 लाख करोड़

यदि हम स्वदेशी आंदोलन की शक्ति से आयातित चीजों को भी बंद कर दें, तो देश को लगभग ₹14 लाख करोड़ का फायदा हो सकता है। यह आंदोलन हम सभी को मिलकर गाँव-गाँव में चलाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां हमें देश के दूसरे ‘स्वदेशी आंदोलन’ के लिए याद रखें।

Scroll to Top